मेरे अहसास: 2012

Ahsaas

Ahsaas
Dil ki baatain

Sunday, 23 September 2012


बोलती आँखें
दिल खोलती आँखें
कहती आँखें

हसीन आँखें
मतवाली आखियाँ
तिरछे नैन

चंचल नैन
करें दिल बैचैन
तडपाय जिया

तेरी ये आँखें
कहें दिल कि बात
क्यों है उदास

Saturday, 4 August 2012

सखी री तुझे 
क्यूँ लगा प्रेम रोग 
ये बड़ा बुरा 

दिल का रोग 
बावरी क्यूँ हुई तू 
करे बेहाल 

खो बैठेगी तू 
सुध बुध अपनी 
हुई बीमार 

देख रही है 
सपन सलोने से 
मन प्रसन्न 

ख्यालों में गुम
नयी नयी प्रीत है 
देखे दर्पण 

मीत से बंधी 
प्रीत की डोर अब 
मुस्काते पल 

Wednesday, 27 June 2012


कबूल नहीं 
आजादी में बेड़ियाँ 
लड़ी बहुत 

झांसी की रानी 
देश की खातिर ही 
हुई कुर्बान

कूदी मैदान 
ना पहनी चूड़ियाँ 
लड़ी जोश में 

लड़ी मर्दानी 
ले बर्छी तलवार 
आखिरी दम 

बहाया लहू 
वार्ता की मिसाल 
ऊँचा है नाम 

उसने किया 
न्योछावर जीवन
देकर प्राण 

बाँध पीठ वो 
मासूम को अपनी 
कूदी मैदान 

दगा दे गए 
अपने ही घर में 
जीतती कैसे 

लड़ी बहुत 
मतवाली थी मनु 
फ़िदा देश पे 

शान देश की 
मन में है सबके 
आज भी जिन्दा 

लक्ष्मी सरीखी 
देश का मान बढे 
पूजो कन्या को 













Friday, 22 June 2012

बगियन में 
नाचा मोर चुराए 
जिया हमरा 

दिल धड़का 
बरसात की बूँद
क्या कहे जाए

झूमा ख़ुशी से
जिया मोरा सनम
को हम भाये

बरसात का
मौसम है साँसों की
गर्मी बढाए

जवाँ दिलों की
नजदीकी तो अब
गहरा रिश्ता

आगोश समाँ
एक दूजे के फिर
बंधे बंधन ............
समां रही वो 
जलतरंग सी क्यूँ 
अंतर्मन में 

खो जाऊं फिर 
सपन सलोने से
देख रही मैं

हाँ तुम्हीं लाये
जीवन में बहार
पहली बार

उपवन भी
खिल रहा सखी री
बरखा आई

मन के तार
मैं न खोलूं सखी री
तड़पन दे

दो दिल एक
होने को बेक़रार
हुए जाते हैं

प्यार किया है
दो दिल एक जान
हुए जाते हैं......
बांसुरी बाजे 
कन्हाई राधा संग 
रास रचावे ......

गोकुल सूना 
बिन तेरे कन्हैय्या
आन बसों ना......


द्रोपदी लाज
द्वारकाधीश आये
बचाने चीर .........
लचकी तोरी 
कमरिया री गोरी 
पनघट पे 

नखरे देख 
जिया मोरा तडपे
मान भी जा री

तोरी गगरी
फोड़ भिगाऊं तुझे
जो तू ना मानी .

राम लखन
दशरथ नंदन
भटके वन

संग सीता माँ
जी कठिन जीवन
पत्नी धर्म है

ब्रह्मण भेष
धर रावन कियो
सीता हरण

हनुमान जी
चार सौ कोस उड़े
समुद्र पार

हनुमान जी
अशोक वाटिका को
दियो उजाड़

दियो लंका को
जलाय, ताकत दी
दिखाए वहां

मारे रावन
छुडाय सीता मैय्या
हुई जीत है ............
मैं तो बच्ची हूँ 
सबसे अच्छी हूँ 
मौज उडाऊ 

जिम्मेदारियां 
अहसास नहीं है
भोला है मन

पंख लगा क्यों
जल्दी से उड़ जाता
ये बचपन

काश फिर से
मैं बच्ची बन पाती
निश्छल मन ..
मित्रों जिनकी आँखें नहीं होती अगर उनका कोई अपना उनकी आँखों की रौशनी बन जाए तो कितना अच्छा हो जाए ये अंधियारा जीवनमें भी उजाला हो जाए ...प्रभु सबकी दुनिया में उजाला रखे सबको आबाद रखे यही कामना है ...शुभरात्रि मित्रों .....

रोशन आँखें 
देखो दुनियाँ प्यारी 
कितनी सुंदर 

जगमगाती
रंगबिरंगी प्यारी
सतरंगी सी

मजबूर हूँ
अंधियारा जीवन
प्रभु सुन ले

भोर की बेला
बिन अखियाँ के मैं
देख ना पाऊं

खूबसूरत
निशा निहारूं कैसे
तड़पे मन

पाया तुझको
तेरी अखियन से
देखूं दुनियाँ

उजाला बना
जिन्दगी में खुशियाँ
लाया बहार

जीवन साथी
ऐसे ही देना प्रभु
सातों जनम ................

प्यार पूजा है 
दो दिलों का रिश्ता है 
इबादत है
आतंकवाद 
परेशान है सब 
पीछा छुड़ाओ

उठाते क्यों हो 
बन्दूक तलवार 
बहुत हुआ

खून खराबा
आखिर कब तक
कैसे रुकेगा

नहीं सहन है
बंदूके दनादन
छलनी मन

बहुत हुआ
बंद करो अत्याचार
जीने दो अब ......
काली बदरी 
आई है घिर कर 
अब बरसी 

मन प्रफुल्ल 
भीग रही संग में 
बरसो मेघा


संचार हुआ
नवजीवन मिला
वर्षा से प्यार

गुनगुनाओ
संग में मिलजुल
राग मल्हार .

राह में काटें 
चलना कैसे छोड़ें 
पानी मंजिल 

डरते नहीं 
मेहनत कश हैं 
मलेगी चाह

घबराते क्यूँ
असलियत देखो
डटे रहेंगे

हार ना मानों
जंगे जिंदगी जीतो
कामना यही .....

लिए है फेरे 
निभाऊं सातों जन्म 
यही कामना 

पी मन भाऊ 
रिश्ता सदा निभाऊं 
जन्म जन्म का

साथ रहूंगी
सुख दुःख में सदा
यही है धर्म

ख़त भेजना 
कल की बात हुई 
लिखना भूले 

इंतज़ार था 
निगाहें दर पर 
डाकिया आजा

पिया का ख़त
पाती प्रेम की आई
मन प्रफुल्ल

फूल गुलाब
सुंदर अहसास
खो गए अब .......................

विधवा विवाह .......
*******************

उम्र है कच्ची
विधवा हुई तो क्या
पुन्ह विवाह

अरमान हैं
उसमें भी जान है
क्यों रहे तन्हा

क्यों जिए बेरंग
गलती क्या उसकी
दोष किसका

कैसे कटेगा
पहाड़ सा जीवन
भर दो रंग ..................अंजना चौहान
 —
है अलबेली 
यह सपनीली सी 
लायी बहार 

देख रही ये 
अपना प्रतिबिम्ब 
कैसा सुंदर

नाज़ुक है ये
फूलों सी कोमल
मुरझाये ना

आँखों में शर्म
चेहरे पे मुस्कान
मासूम कन्या

लहराते है
केश घने सुंदर
लगती प्यारी

बसी नैनो में
ये मूरत सुंदर
रोज निहारूं

पिया आये हैं
दिन बीते हैं कई
प्यासा है मन

Saturday, 26 May 2012


तुम्हारे मेरे बीच क्यूँ ये दूरियां बढ़ रही ,बताओ  ?
ये शब्दों का झुरमुट बढाता फासला क्यूँ है ?
शब्दों की इस भीड़ में तुम मौन !! मैं क्या समझूँ ?
अपनों की इस भीड़ में बेगाने से तुम !! बेगाना कौन ?
मैं तुम्हें ,तुम्हारे इस रूप को क्या नाम दूँ ?
तुम्हारे मेरे बीच अब जब कैसी भी दीवार नहीं
फिर  भी तुम्हारी  बेरुखी !! मैं क्या समझूँ ?
भावनाओं का मायाजाल ,छलावा कुछ पलों का ,या मजबूरी नाम दे दूँ !!
तुम्हारा ये मौन, तुम्हारी ये चुप्पी ,तुम कुछ कहते क्यूँ नहीं?
किन्तु ये बहुत कुछ कह जाती है
जैसे टूट कर तारा गिरता है जमीं पर वैसे ही
मैं भी टूट कर बिखरने को मजबूर
बचा सकते हो तो थाम लो आकर
कह दो तुम मेरे हो सदा के लिए
तुम्हारा प्यार छलावा नहीं मेरे लिए
बस तुम्हारा इतना कह देना ही काफी है ,मुझमें फिर से जान डालने को
तुम्हारे चन्द शब्दों को तरसती मैं तुम्हारे इंतज़ार में
जानती हूँ तुम आओगे जरूर कुछ विश्वास सा होता है खुद पर ही
फासले बनते हैं तो दूरियां भी मिटती जरूर हैं
बस अब वो दूरी मिटने का इंतज़ार
पल पल तुम्हें देखने को तरसती आँखें
कहीं यूँ ही इंतज़ार करते करते बंद न हो जाएँ प्रियतम, आ जाओ
अब तो आ जाओ ,तुम्हारी चाहत में बस यही गुहार
अब तो आ जाओ !!अब तो आ जाओ .........

_______________अंजना चौहान ____________________

Monday, 21 May 2012


बरसात का सुहाना मौसम

पवन मंद मंद मुस्काए
भावों को संग बहा ले जाए
कभी बहते हैं जल में गहरे तक
कभी बादलों के ऊपर उड़ जाएँ
निखत छुप रहे ओटन में बदली की
बदल रहे घुमड़ घुमड़ मुस्काए
बिजली कड़क रही है मानो
अपना प्यार बताती सी
बूंदे पद रही हैं रिमझिम सी
प्रेम सुधा बरसाती सी
प्रकृति का यह रूप मनोरम
मन को सबके हर लेता है
खिल जाते हैं फूल बगिया में मन की
ये मन चंचल कर देता है _______________अंजना चौहान