है अलबेली
यह सपनीली सी
लायी बहार
देख रही ये
अपना प्रतिबिम्ब
कैसा सुंदर
नाज़ुक है ये
फूलों सी कोमल
मुरझाये ना
आँखों में शर्म
चेहरे पे मुस्कान
मासूम कन्या
लहराते है
केश घने सुंदर
लगती प्यारी
बसी नैनो में
ये मूरत सुंदर
रोज निहारूं
पिया आये हैं
दिन बीते हैं कईप्यासा है मन
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