समां रही वो जलतरंग सी क्यूँ अंतर्मन में खो जाऊं फिर सपन सलोने से
देख रही मैं
हाँ तुम्हीं लाये
जीवन में बहार
पहली बार
उपवन भी
खिल रहा सखी री
बरखा आई
मन के तार
मैं न खोलूं सखी री
तड़पन दे
दो दिल एक
होने को बेक़रार
हुए जाते हैं
प्यार किया है
दो दिल एक जान
हुए जाते हैं......
वाह प्रस्तुतिकरण का सुन्दर अंदाज़
ReplyDeleteपंक्तियां मन को प्रफुलित कर रही हैं