तुम्हारे मेरे बीच क्यूँ ये दूरियां बढ़ रही ,बताओ ?
ये शब्दों का झुरमुट बढाता फासला क्यूँ है ?
शब्दों की इस भीड़ में तुम मौन !! मैं क्या समझूँ ?
अपनों की इस भीड़ में बेगाने से तुम !! बेगाना कौन ?
मैं तुम्हें ,तुम्हारे इस रूप को क्या नाम दूँ ?
तुम्हारे मेरे बीच अब जब कैसी भी दीवार नहीं
फिर भी तुम्हारी बेरुखी !! मैं क्या समझूँ ?
भावनाओं का मायाजाल ,छलावा कुछ पलों का ,या मजबूरी नाम दे दूँ !!
तुम्हारा ये मौन, तुम्हारी ये चुप्पी ,तुम कुछ कहते क्यूँ नहीं?
किन्तु ये बहुत कुछ कह जाती है
जैसे टूट कर तारा गिरता है जमीं पर वैसे ही
मैं भी टूट कर बिखरने को मजबूर
बचा सकते हो तो थाम लो आकर
कह दो तुम मेरे हो सदा के लिए
तुम्हारा प्यार छलावा नहीं मेरे लिए
बस तुम्हारा इतना कह देना ही काफी है ,मुझमें फिर से जान डालने को
तुम्हारे चन्द शब्दों को तरसती मैं तुम्हारे इंतज़ार में
जानती हूँ तुम आओगे जरूर कुछ विश्वास सा होता है खुद पर ही
फासले बनते हैं तो दूरियां भी मिटती जरूर हैं
बस अब वो दूरी मिटने का इंतज़ार
पल पल तुम्हें देखने को तरसती आँखें
कहीं यूँ ही इंतज़ार करते करते बंद न हो जाएँ प्रियतम, आ जाओ
अब तो आ जाओ ,तुम्हारी चाहत में बस यही गुहार
अब तो आ जाओ !!अब तो आ जाओ .........
_______________अंजना चौहान ____________________

